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कविता

  इस्तेमाल आदमी को आदमी इस्तेमाल कर रहा तरह तरह के रिश्ते बना कर एक दूसरे को ठग रहा। भरोसा करने वालों का हर रोज भरोसा टूट रहा भरोसा तोड़ने वाला ऐश कर रहा। सत्य की खोज करने वाला खोज करता रहा झूठ अपने आप में पलता रहा। ओ दुनिया बनाने वाले सब कुछ बना कर तुझे क्या मिल रहा आदमी को क्यों इस तरह परेशान कर रहा। बता दे तू भला अक्ल देकर क्यों अक्ल हर रहा आदमी को क्यों सिखाया जाल बुनना जो बुन कर उसी में फँस रहा।                     डॉ. सत्येंद्र सिंह                       पुणे, महाराष्ट्र 

जीवन की आपाधापी

 जीना तो अपने हाथ में नहीं है। जीवन की डोर भी किसी के हाथ में है ऐसा लगता है। खैर जिस पर अपना वंश नहीं उस पर क्या सोचना। पर जो घटित होता है उसका प्रभाव तो मन पर पड़ता है। गुजरात में एक पुल आधे में टूटकर बह गया और कई वाहन उसमें गिर पड़े। यह मानव निर्मित है।     कल सोसायटी में पानी के कलेक्शन करना था। कुछ कहने लगे कि पानी तो आता ही नहीं कलेक्शन किस बात का। स्वयं जाकर देखा तो पानी अच्छा खासा आ रहा था।   लाइट के नए कुछ पोल लगे और एक महीने बाद उन्हें कनेक्ट किया गया तो जहां पोल लगने बाकी हैं वहां खलबली मच गई। ऐसा लगा कि सोसायटी दो हिस्सों में बंटी गई हो।       नई दिल्ली में एक रिश्तेदार की बेटी पहली मंजिल से गिर गई। सिर में चोट आई है। अभी तक होश नहीं आया। बच्ची की दादी मुझसे बोलती नहीं।      बड़े भाईसाहब का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है। भतीजे ने फोटो भेजा था। फोटो में तो अच्छे लग रहे थे।        जन्मदिन की शुभकामनाएं देनी हैं। विवाह वर्षगांठ की बधाई देनी हैं। फेसबुक पर रचनाएं पढ़नी हैं और कमेंट करना है।     वाट्सएप...

पाखंड के आयाम

  लघुकथा                    पाखंड के आयाम      मैं समुद्र के पास रहता था इसलिए रोज समुद्र के किनारे घूमने जाता। सुबह छ: बजे से सात बजे तक। काफी लोग सैर करते हुए दिखाई देते। कुछ परिचित और की अपरिचितों से परिचय हो जाया करता। गप शप और सैर एक साथ। इधर उधर की  भी मिल जाती।  सुबह किनारे सुबह हवा बहुत आनंद देती है, प्राणवायु जो ठहरी।      रेती के किनारे बड़े बड़े काले पत्थर हैं वहां और उन पर बैठ कर सुस्ताने वाले भी दिखते। कुछ जोड़े में भी रहते। हंसते खिलखिलाते। बड़ा अच्छा लगता।      एक दिन एक काले पत्थर पर नजर टिक गई। लगा कि मेरे अच्छे परिचित हैं परंतु वे ऊपर से नीचे एकदम काले कपड़े धारण किए हुए थे और चेहरा नीचे किए हुए।  मुझे संकोच हो रहा था कि नजदीक जाऊं या नहीं क्योंकि ऐसी वेषभूषा में कभी देखा नहीं था। कद काठी से वही परिचित से लग रहे थे। फिर भी संकोच वश मैं उनके नजदीक नहीं गया।      लेकिन सैर करते ...
  अभिव्यक्ति दोहे भाषण कथन उक्ति या हो व्याख्यान, सोच समझ बोलिए हे मनुज सुजान।१। बोली वाणी व्यक्ति की है वाकी पहचान, जैसे शब्द ऊचरै , बने दूजे कौ परिधान।२। भाव विचार व्यक्त करै सो ही व्यक्ति होय, सत्य न्याय स्पष्टता है अभिव्यक्ति सोय। ३। अधिकार समझ न बोलिए कोई कुविचार, निजता कलुषित होय अरु फैले अत्याचार।४। कर्तव्य अधिकार में, मान कें चले जो भेद, नागरिक कभी  न बन सके, पढ ले चारों वेद।५। अंतर कभी न कीजिए , राष्ट्र देश समाज , मानव को ना बांट सकें, धर्म पंथ व जात।६। विश्व बंधुत्व का भाव हिय में रखो संजोय, भारत देश की  एकता सदा अखंडित होय।७।                                डॉ सत्येंद्र सिंह                                  पुणे, महाराष्ट्र     ...

जल संकट

 पुणे में फरबरी 2025 में ही गर्मी इतनी पड़ रही है और आसपास के क्षेत्र में जल स्तर गिरता जा रहा है। घरों में जो पुणे महानगरपालिका का पानी आता है वह बहुत कम प्रैशर से आ रहा है। मैं अपनी सोसायटी का चेयरमैन हूँ और लोग मेरे पास पानी कम प्रैशर से आने की शिकायत करते हैं। मैं पानी सप्लाई करने वाले ऑपरेटर से बात करता हूँ। वह बताते हैं कि वे अपनी ओर से पूरा पानी खोलते हैं लेकिन प्रैशर कम क्यों है इसके लिए कुछ नहीं कर सकते।    हमारे क्षेत्र के समाज सेवक हैं प्रसाद जगताप जो पहले आंबेगांव खुर्द ग्रामपंचायत के सदस्य थे और अब नगर सेवक के उम्मीदवार हैं। उन्होंने हमारे क्षेत्र में पानी लाने, ड्रेनेज डलवाने और रोड बनवाने की दिशा में बहुत उल्लेखनीय कार्य किया है। इसलिए आज मैंने वाट्सएप पर प्रैशर कम आने के बारे में लिखा है। पुणे महानगरपालिका की ओर से वाट्सएप मोबाइल नंबर जारी किया है जिस पर सारी शिकायतें की जा सकती हैं।  ऐसे ही महाराष्ट्र राज्य बिजली बोर्ड ने भी ऐसा नंबर जारी किया है। मैं दोनों पर हिंदी में शिकायत दर्ज करता हूँ और उन पर कार्रवाई भी होती है।        लेक...
  लघुकथा                        परामर्श      समस्याएँ तो सबके जीवन में हैं बेटे, पर समस्या का समाधान भी उसीमें रहता है और इसको जो समझ लेता है वह कभी निराश नहीं होता, शिवशंकर जी अपने पुत्र को समझाते हुए कह रहे थे। पुत्र राम शंकर बड़े ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। तभी शिव शंकर जी के मोबाइल की घंटी बजने लगी। उन्होंने मोबाइल की ओर देखा, गांव से उनके एक मित्र का फोन था। हेलो कहते हुए उन्होंने उठाया। हाँ मैं रामधन बोल रहा हूँ। हालचाल पूछने के बाद बोले, "अरे यार क्या बताऊँ, वह जो छोटी बहू है, बहुत धमकी दे रही है कि वह कुछ ऐसा करेगी कि पूरा घर जेल में होगा। कभी छत पर चढ जाती है कभी दरवाजे पर खड़ी हो कर चिल्लाती है। समझ में नहीं आ रहा है, क्या करूँ? उसके पिता से कहा तो वह भी चुप लगा गए।"       शिव शंकर जी ने पूछा, "वह चाहती क्या है, यह पता किया?"       रामधन बोले, "वह चाहती है कि पूरी पैंशन के पैसे मैं घर में ...
  जिज्ञासा सवाल पूछने का भी कोई अधिकार होता है या जिज्ञासा होती है, आजकल यह भी सवाल बन गया है क्योंकि सवाल पूछने के लिए जिम्मेदार लोग पहले उनका हित देखते हैं जिनसे सवाल पूछना है और जिनके लिए सच में सवाल पूछना है वे उनकी सोच में थे या हैं, पता नहीं। सत्य को सब जानना चाहते हैं पाना चाहते हैं जीना चाहते हैं पर सत्य को दबाकर। सत्य को पाने के लिए सबसे पहले वरणीय है जिज्ञासा आप्त वचन है ब्रह्म ही सत्य है इसलिए आवश्यक है ब्रह्म जिज्ञासा पर प्रश्न पूछने की जिज्ञासा मर रही है ऐसा लगता है । बिना प्रश्न के जिज्ञासा का अस्तित्व क्या है जब प्रश्न करना संकोच बनता है भय का जन्म करता है और जिज्ञासा तिरोहित प्रतीत होती है तब जीवन मरता है परंतु सजीव हो उठती है जिज्ञासा दिलों के अंदर और विस्फोट बन जाती है चेहरों पर चिपक जाती है। उत्तर के उत्तरदाई निष्प्रभ हो जाते हैं इसलिए जिज्ञासा मर नहीं सकती न उसे मरने देना चाहिए जैसे आग को राख दबा सकती है खत्म नहीं कर सकती जिज्ञासा को दबा सकते हैं पर खत्म नहीं कर सकते।         ...

लघुकथा

  लघुकथा                         उसूल               माधव और रघु दोनों बचपन से मित्र हैं। दोनों अपने अपने काम में माहिर। दोनों साथ साथ पढे। माधव ने आईटीआई कर लिया और रघु ने प्लंबिंग का काम सीख लिया। दोनों की पारिवारिक परिस्थितियों ने उच्च शिक्षा ग्रहण न करने दी परंतु दोनों मेहनती थे और अपनी मेहनत की कमाई से खुश भी। दोनों का विवाह हो गया तो गांव से मुंबई आ गए।       माधव ने मेकेनिकल इंजीनियरिंग में आईटीआई किया था सो उसे काम मिलने में दिक्कत नहीं हुई। रघु को शुरू में काम तलाशने में थोड़ी परेशानी तो हुई लेकिन प्लम्बिंग में होशियार होने के कारण जहाँ काम करता वहाँ पसंद किया जाता और जिन-जिनके यहाँ काम करता वे लोग जरूरत पड़ने पर उसी को बुलाते और अपने मित्रो के यहाँ भी भेजते। इस प्रकार रघु की आमदनी भी ठीक ठाक थी। दोनों अपने अपने परिवार के साथ कल्याण में एक ही  बिल्डिंग में रहते थे । ...

चिंता

किसान परिवार पूरा, मेहनत करता जाए, न लागत मिलती न मेहनत का फल पाए। खेत और बागान से, सबका भरता है पेट, पैसे वाले के पेट भरे, किसान का खाली पेट। सीताफल अमरूद सड़ रहा देखे सारा देश, कृषक उजाड़े बाग़ सब, बाँध खाली पेट। सबको चिंता व्यापती केवल शब्दन माँहि, घर में खावें चूपडी  बाहर फिकर जताहिं। आटा रुपए पचास का, मिलता बीच बजार, भाजी पाला कीट संग, दालें बिकें हैं सौ पार। शंकर राम घनश्याम तुम दीनों के हो करतार, किरपा कर पेट भर दीजिए सबके पालनहार।               सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र 

लघुकथा

  लघुकथा :                     अनदेखी      बाबू रामदयाल सक्सेना पुणे में घूमने आए ।  यहाँ के दर्शनीय स्थल व मौसम उन्हें बहुत अच्छा लगा। उन्हें सिटी बस सेवा भी बहुत अच्छी लगी। बहुत कम पैसों में एक कोने से दूसरे कोने तक जा सकते हैं। उन्हें पता चला कि स्वारगेट और कात्रज के बीच सिटी बस के अलग रोड है जिस केवल बस चलती है और बस स्टॉप भी उस रोड पर अंदर ही बने हैं और बस के दरवाजे बीच में बस स्टॉप पर ही खुलते हैं। एकदम सुरक्षित यात्रा। इसे बीआरटी लाइन कहते हैं। निजी वाहन इस बीआरटी लाइन के इधर उधर चलते हैं और इस लाइन में नहीं आते। एक दिन वे स्वारगेट से कात्रज की ओर उसी रूट पर चले। बस में चढे , ड्रायवर के पीछे सीनियर सिटीजन के लिए आरक्षित सीट मिल गई। वे उस सीट पर बैठे जहाँ से सामने आने जाने वाले वाहन दिखाई दे रहे थे।  उन्होंने देखा कि सामने से दांई ओर एक बस आ रही है और अचानक उस बस को ओवरटेक करके एक मोटर साइकिल पर तीन लड़के विपरीत दिशा से उनकी बस की दौड़े चले आ रहे हैं...

वियोगी हरि - एक संस्मरण

             वियोगी हरि जी - एक संस्मरण सन् 1969-70 की बात है । मैं श्रीकृष्ण -जन्मस्थान-सेवासंघ मथुरा के कार्यालय में टाइपिंग का कार्य करता था। बारहवीं विज्ञान में अनुत्तीर्ण होने के बाद आगे पढने की गुंजाइश नहीं थी। अंग्रेजी तो क्या क्ष, हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी। परंतु हिंदी टाइपिंग का अच्छा अभ्यास था और शॉर्टहैंड भी सीख रहा था। ट्रस्ट के संयुक्त सचिव थे पं देवधर शर्मा शास्त्री। उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। व्यवस्थापक थे श्री बंशीधर उपाध्याय, जो शास्त्री जी की डिक्टेशन लेते थे। धीरे धीरे उनके प्रोत्साहन से मुझमें शास्त्री जी की डिक्टेशन लेने का साहस पैदा हो गया। मेरी हिंदी भी अच्छी होती गई। शास्त्री जी से भय बहुत लगता था क्योंकि हिंदी में जरा भी गलती हो जाए तो बहुत डांटते थे।  काम करते करते यह तो पता चल ही गया था कि पूज्य वियोगी हरि जी सेवासंघ के सचिव थे। बिरला जी के अधिकांश ट्रस्टों के सचिव थे वे। हिंदी पाठ्यक्रम में उनके दोहे और निबंध पढे थे इसलिए उनके प्रति स्वभात: एक अनकही अजीब सी श्रद्धा जाग गई थी। बस प्रतीक्षा थी उनके ...

रेल अस्पताल और इलाज़

                रेल अस्पताल और इलाज      रेल अस्पताल में डॉक्टर के चैंबर के सामने लाइन में खड़ा था कि एक मित्र का फोन आ गया। मैंने बताया कि मैं कहाँ हूँ। मेरे मित्र ने कहा कि सरकार अस्पताल की दवा उतनी प्रभावी नहीं होती, जितनी प्राइवेट डॉक्टर द्वारा लिखी अच्छी कंपनी की दवा। पता नहीं, इस बात में कितनी सच्चाई है और यह धारणा क्यों बनी, परंतु सच यह है कि रेलवे अस्पताल में इलाज कराने का अपना ही आनंद है। केस पेपर बनबाने के लिए लाइन, डॉक्टर के पास जाने के लिए लाइन और फिर दवा लेने के लिए लाइन। लाइन तोड़ने वालों से तू-तू, मैं -मैं, आते जाते परिचितों से बातचीत और नोंकझोंक, अपनी अपनी बीमारी का बखान, केस पेपर बनाने वाले बाबू की शिकायत, डॉक्टरों की बुराई और तारीफ सब कुछ याद आने लगा।      अधिकारी की डायरी जेब में दिखती हुई रखकर कर्मचारियों की लाइन में आगे जाकर खड़े होने की सुविधा कब और कहाँ से पैदा हो गई यह तो नहीं पता लेकिन मुझे यह कतई पसंद नहीं कि जो घंटों से लाइन में खड़े हैं उनसे आगे जाया जाए या सीधे डॉक्टर के पास चला जाया जाए। ...

भ्रष्टाचार मुक्ति

                              हर वर्ष भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की कसमें खाई जाती हैं, संकल्प किए जाते हैं, कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है पर भ्रष्टाचार है कि न जाने का नाम लेता है और न व्यक्ति को, भारत को, संसार को मुक्त करता है। यही नहीं नए-नए रूपों में देश में, प्रदेश में, समाज में प्रवेश करता रहता है। वैसे देखा जाए तो देश, प्रदेश व समाज तो जड़ हैं और जड़ता में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार की क्या औकात है? जो कुछ होता है चेतन में होता है, जो कुछ करता है वह चेतन करता है। पता नहीं व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार न करने, न सहने की कसम खाता है या नहीं। सामूहिक रूप से अवश्य कसम खाता है। व्यक्तिगत रूप से कसम खा ले तो भ्रष्टाचार रहेगा कहाँ?       व्यक्ति के मन में, सोच में ही सब कुछ रहता है और जब वह कार्यरूप में परिणत होता है तब दिखाई देता है कि कुछ हुआ। भ्रष्टाचार एक व्यक्ति करता है, दूसरा सहता है, तीसरा दुखी होता है और चौथा कसम खाता है। यह कैसी विडम्बना है। लेकिन...
                 जैसी करनी वैसी भरनी      जैसी करनी वैसी भरनी, टीवी में एक बाल कलाकार जब गा रहा था कब मैं खाना खा रहा था और जीभ पर दाँत उस जगह लगा जहाँ पटले जीभ काट दी थी। खाते खाते मैं सुन्न हो गया।  मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है कि एक बार जहाँ जीभ कट जाती है वहीं दंत महाशय प्रहार करते हैं। थोड़ी राहत मिली और मैं सोचने लायक हुआ तो सबसे पहले यही खयाल आया कि ऐसा मैंने कर दिया जो ऐसा फल मिला है। न जीभ से कुछ कहा न ही दाँत से। उन दोनों में अनबन है तो मैं क्या करूं?  दाँत का धर्म ही काटना है तो जीभ के भाग्य में भी सहना  बदा है। लेकिन तकलीफ मुझे महसूस होती है। दाँत को काटना है, काटे, जीभ को सहना है सहे, मैं इनके बीच कहाँ से आ गया। मैंने ऐसा कौन सा कर्म किया जो तकलीफ मुझे महसूस होती है।      ऐसे ही एक दिन सुबह बाजार जा रहा था कि सड़क किनारे चबूतरे पर बैठे दो मित्रों ने आवाज लगा कर अपने पास बुला लिया। वे आपस में बहस कर रहे थे। एक कह रहा था कि तू पप्पू है और दूसरा कह रहा था कि तू कौन सा मोदी है?  दोनो...

हिंदी दिवस 2

 अभी अभी मैंने हिंदी दिवस पर ब्लॉग लिखा जिसमें अपनी भूल जाहिर की कि मैं एक दिन हिंदी दिवस ही भूल गया। पर हिंदी दिवस के दिन सभी को शुभकामनाएँ दीं। मेरे ब्लॉग में समाहित दिनेश पाठक शशि की पोस्ट पर काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की नई दिल्ली से डॉ सोमदत्त शर्मा ने  मुंबई से डॉ वीरेंद्र कुमार मिश्र ने प्रतिक्रिया स्वरूप कई तथ्य उजागर कर दिए, जिन्हें मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-  " इसके साथ कुछ और स्मरण हो रहा है। १. सोवियत संघ में स्वतंत्र भारत (उस समय यह भारतवर्ष था, इंडिया नहीं) की पहली राजदूत  जवाहरलाल नेहरू की बहन पंडित विजयलक्ष्मी ने जब वहां पहुंच कर अपना परिचय पत्र अंग्रेजी में दिया तो सोवियत सरकार ने उसे स्वीकार नहीं किया, और कहा कि आप अपनी राजभाषा में यह परिचय पत्र दें। रातों रात विशेष विमान से हिंदी में परिचय पत्र भेजा गया उसके पश्चात ही उन्हें राजदूत मान कर राजदूतावास में प्रवेश दिया गया। २. शशी कपूर ने अपनी फिल्म *३६ चौरंगी लेन* जब विश्व फिल्म फेस्टिवल में भेजी तो वह यह कह कर वापस कर दी गई कि आप अपने देश की (राज)भाषा की फिल्म भेजें, अंग्रेज़ी की बहुत फिल्में यहां...

होली और श्रीकृष्ण

                                            होली विशेषकर रंगों की होली, आनंद की होली ब्रज में श्रीकृष्ण से शुरू होकर पूरे विश्व में फैल गई।  वैसे तो होली की मुख्य कहानी प्रहलाद और होलिका की है, शिवजी द्वारा कामदेव को भस्म करने और जीवित करने की है परंतु रंगों से सामने वाले को सराबोर कर देना श्री कृष्ण से ही शुरू हुई। श्री कृष्ण जब राधाजी के रूप से चिढते हैं, पूतना को मार उसके विषपान से और काले हो जाते हैं तो स्वयं गोरा होने का प्रयास नहीं करते वरन् राधाजी के गोरेपन की शिकायत यशोदा जी से करते हैं। माँ कह देती हैं कि जा तू राधा के मुँह पर कोई भी रंग मल दे। और अपनी मित्र मंडली के साथ दौड़ लगा देते हैं बरसाने की ओर। राधाजी और अन्य गोपियों को विभिन्न रंगों से रँग देते हैं। गोपियाँ कहाँ पीछे रहने वाली थीं, वे भी कृष्ण का कालापन दूर करने में लग जाती हैं और वर्ष में एक दिन एक दूसरे पर रंग डालने की प्रथा होली बन जाती है।       लेखकों कवियों ने श्र...

अठखेलियाँ

 जीवन अपने आप से ही अठखेलियाँ खेलता है। पचास साल के वैवाहिक जीवन में पत्नी जी पहली बार बीमार ही नहीं हुई अस्पताल में भर्ती भी हो गई। मानो तूफान आ गया। मैं तीस पैंतीस साल से डायबिटीज, स्पांडलाइटिस व अवसाद से जूझ रहा हूँ पर कोई बीमार ही नहीं मानता। पत्नी जी बीमार हुईं तो मुझे भी लगा कि मैं वास्तव में दोगुना बीमार हो गया पर साथ ही उनकी सेवादारी में अपनी बीमारी भूल ही गया। एक अनजाने भय से ग्रस्त हो गया कि पत्नी जी चली गई तो मेरा क्या होगा। अचानक ही आसमान की ओर हाथ उठ जाते हैं कि हे पालनहारे ऐसा न करना। जोड़ी बिछड़े न। विदा हो तो एक साथ। सत्येंद्र सिंह

आऊंगा

 आऊंगा  तुम्हारे पास  अवश्य/स्वप्न में सही  पर आऊंगा अवश्य। मानलो  किसी कारणवश मैं नहीं आ पाया तो तुम्हीं चले आना  जागते में सोते में  स्वप्न में पर आना। सत्येंद्र सिंह

झरोखे (२)

 पुलिस रिपोर्ट में उसका नाम भी था। उसे पता चला। लेकिन वह घबराया नहीं, क्योंकि उसने कुछ गलत किया ही नहीं था। प्रभारी एक महिला थी। उसका मुँह कुछ टेढ़ा था और एक आँख छोटी थी। कानी तो नहीं थी पर लगती कानी थी। वह किसी का न तो अच्छा कर सकती थी और न अच्छा देख सकती थी। बॉस तेज तर्रार था सो उससे डरती ही नहीं घबराती भी थी। लेकिन जब सुशीला के पिता ने बॉस के विरुद्ध पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी तबसे वह समाज सेविका और निर्भीक शेरनी बन गई थी। सुशीला की हमदर्द बन गई और उसे सामने रखकर सभी महिलाओं को एकत्र कर लंच समय में ऑफिस के चारों ओर जुलूस निकालती। एक दिन उससे बोली कि तुम्हें पुलिस इंस्पेक्टर नगरकर ढूंढ रहा था। उसने घूरा ढूंढ रहा था तो उसने आँख मिचकाली। वह इंस्पेक्टर के पास पहुँचा।  अपना परिचय दिया तो इंस्पेक्टर ने बड़े सम्मान से बिठाया और पूछा कि क्या मामला था तो उसने बताया कुछ नहीं। इंस्पेक्टर ने हँस कर कहा, यह हम भी जानते हैं कि यहाँ ऐसा कोई कमरा नहीं कि किसी पोस्टग्रेजुएट लड़की को खींचकर ले जाया जा सके। ऐसी झूठी और बेबुनियाद की रिपोर्ट हमारे पास बहुत आती हैं। इंस्पेक्टर ने उसस...

दुश्मन भारत

  यह पोस्ट लिखना नहीं चाहता था परंतु 13-14 साल हो गए हृदय को मथे डाल रही है। 2006-07 में झाँसी से स्थानांतरित होकर मुंबई आया था। झा साहब की मेज पर एक आमंत्रण पत्र देखा, जो प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा और एक संस्था की ओर से भी था। कार्यक्रम नेहरू प्लेनेटोरियम में था। मैंने उनसे अनुमति लेकर कार्ड देखा, उसमें विविध कार्यक्रम थे, नाटक व कवि-सम्मेलन भी। कवि सम्मेलन में आदरणीय श्री लीलाधर मंडलोई जी भी पधार रहे थे। जहाँ तक मुझे याद है उस समय वे प्रसार भारती के महानिदेशक थे। उनका नाम देखकर कार्यक्रम में जाने की उत्कंठा बढ़ गई। हालांकि उस समय मैं पनवेल में रहता था। फिर भी हिम्मत नहीं हारी और झा साहब से अनुरोध किया कि मैं भी कार्यक्रम में चलूंगा। खैर उनके साथ गया। कार्यालय कार्य के बाद झा साहब का व्यवहार बहुत मृदु और आत्मीय था। कार्यक्रम के बीच में चायपान के लिए कुछ समय के लिए प्रकाश हुआ तो आसपास बैठे लोग आपसी बातचीत में लग गए। मेरे पास दो महिलाएँ बैठी थीं। मैं उनसे बात करने लगा। उन्होंने बताया कि वे पाकिस्तान से आई है और वहाँ पर शिक्षक हैं। मैंने वहाँ शिक्षा और पाठ्यक्रम के बारे में पूछा ...