लघुकथा

 लघुकथा :

                    अनदेखी
    
बाबू रामदयाल सक्सेना पुणे में घूमने आए ।  यहाँ के दर्शनीय स्थल व मौसम उन्हें बहुत अच्छा लगा। उन्हें सिटी बस सेवा भी बहुत अच्छी लगी। बहुत कम पैसों में एक कोने से दूसरे कोने तक जा सकते हैं। उन्हें पता चला कि स्वारगेट और कात्रज के बीच सिटी बस के अलग रोड है जिस केवल बस चलती है और बस स्टॉप भी उस रोड पर अंदर ही बने हैं और बस के दरवाजे बीच में बस स्टॉप पर ही खुलते हैं। एकदम सुरक्षित यात्रा। इसे बीआरटी लाइन कहते हैं। निजी वाहन इस बीआरटी लाइन के इधर उधर चलते हैं और इस लाइन में नहीं आते। एक दिन वे स्वारगेट से कात्रज की ओर उसी रूट पर चले। बस में चढे , ड्रायवर के पीछे सीनियर सिटीजन के लिए आरक्षित सीट मिल गई। वे उस सीट पर बैठे जहाँ से सामने आने जाने वाले वाहन दिखाई दे रहे थे।  उन्होंने देखा कि सामने से दांई ओर एक बस आ रही है और अचानक उस बस को ओवरटेक करके एक मोटर साइकिल पर तीन लड़के विपरीत दिशा से उनकी बस की दौड़े चले आ रहे हैं। और उनकी  बस के सामने से कट मारते हुए दांई ओर तेजी से निकल गए।  वे यह देखकर सन्न रह गए। जरा भी चूक हो जाती तो वह बाइक उनकी बस के नीचे या सामने से आ रही बस के नीचे आ सकती थी। ऐसा होता तो क्या होता? उनके मन में तमाम प्रश्न उठने लगे। एक बाइक पर तीन लड़के कैसे? लड़कों की उम्र भी कम लग रही थी। उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस कैसे मिला, था भी कि नहीं। ट्रैफिक पुलिस ने बीआरटी लाइन में कैसे आने दिया? क्या उन लड़कों के माँ बाप को मालूम है कि उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? दुर्घटना होने पर दोष, आरोप प्रत्यारोप की झड़ी लग जाएगी। पर जो बड़े जतन से सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था की गई है, उसका क्या होगा। सोचते सोचते उन्हें एक झटका लगा और देखा कि बस रुकी हुई है। वे जल्दी से उठे बस के बीच वाले खुले गेट से स्टॉप पर उतर गए। कौन सा स्टॉप है, यह देखने की उन्होंने कोशिश नहीं की। दूसरी ओर से आने वाली बस से वापस स्वारगेट आ गए। घर भी पहुंच गए पर प्रश्न उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। व्यवस्था की अनदेखी उन्हें कचोट रही थी।

                                      डॉ. सत्येंद्र सिंह
                                         पुणे महाराष्ट्र 

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