जिज्ञासा


सवाल पूछने का भी कोई
अधिकार होता है
या जिज्ञासा होती है,
आजकल यह भी
सवाल बन गया है
क्योंकि
सवाल पूछने के लिए
जिम्मेदार लोग
पहले उनका हित देखते हैं
जिनसे सवाल पूछना है
और जिनके लिए
सच में सवाल पूछना है
वे उनकी सोच में
थे या हैं, पता नहीं।

सत्य को सब जानना चाहते हैं
पाना चाहते हैं
जीना चाहते हैं
पर सत्य को दबाकर।
सत्य को पाने के लिए
सबसे पहले वरणीय है
जिज्ञासा
आप्त वचन है
ब्रह्म ही सत्य है
इसलिए आवश्यक है
ब्रह्म जिज्ञासा
पर प्रश्न पूछने की जिज्ञासा
मर रही है
ऐसा लगता है ।

बिना प्रश्न के
जिज्ञासा का अस्तित्व क्या है
जब प्रश्न करना संकोच बनता है
भय का जन्म करता है
और जिज्ञासा तिरोहित प्रतीत होती है
तब जीवन मरता है
परंतु सजीव हो उठती है
जिज्ञासा
दिलों के अंदर
और विस्फोट बन जाती है
चेहरों पर चिपक जाती है।

उत्तर के उत्तरदाई
निष्प्रभ हो जाते हैं
इसलिए जिज्ञासा मर नहीं सकती
न उसे मरने देना चाहिए
जैसे आग को राख दबा सकती है
खत्म नहीं कर सकती
जिज्ञासा को दबा सकते हैं
पर खत्म नहीं कर सकते।

                         डॉ. सत्येंद्र सिंह
                          पुणे, महाराष्ट्र 

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