झरोखे (२)
पुलिस रिपोर्ट में उसका नाम भी था। उसे पता चला। लेकिन वह घबराया नहीं, क्योंकि उसने कुछ गलत किया ही नहीं था। प्रभारी एक महिला थी। उसका मुँह कुछ टेढ़ा था और एक आँख छोटी थी। कानी तो नहीं थी पर लगती कानी थी। वह किसी का न तो अच्छा कर सकती थी और न अच्छा देख सकती थी। बॉस तेज तर्रार था सो उससे डरती ही नहीं घबराती भी थी। लेकिन जब सुशीला के पिता ने बॉस के विरुद्ध पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी तबसे वह समाज सेविका और निर्भीक शेरनी बन गई थी। सुशीला की हमदर्द बन गई और उसे सामने रखकर सभी महिलाओं को एकत्र कर लंच समय में ऑफिस के चारों ओर जुलूस निकालती। एक दिन उससे बोली कि तुम्हें पुलिस इंस्पेक्टर नगरकर ढूंढ रहा था। उसने घूरा ढूंढ रहा था तो उसने आँख मिचकाली। वह इंस्पेक्टर के पास पहुँचा। अपना परिचय दिया तो इंस्पेक्टर ने बड़े सम्मान से बिठाया और पूछा कि क्या मामला था तो उसने बताया कुछ नहीं। इंस्पेक्टर ने हँस कर कहा, यह हम भी जानते हैं कि यहाँ ऐसा कोई कमरा नहीं कि किसी पोस्टग्रेजुएट लड़की को खींचकर ले जाया जा सके। ऐसी झूठी और बेबुनियाद की रिपोर्ट हमारे पास बहुत आती हैं। इंस्पेक्टर ने उससे हाजिरी के हस्ताक्षर करवाए और जाने दिया। वो एक आँख फैलाए तैयार बैठी थी कि वह कब आए और उससे पूछे कि पुलिस ने कितना मारा लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान देख पूछने की हिम्मत नहीं कर सकी।
सत्येंद्र सिंह
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