दुश्मन भारत
यह पोस्ट लिखना नहीं चाहता था परंतु 13-14 साल हो गए हृदय को मथे डाल रही है। 2006-07 में झाँसी से स्थानांतरित होकर मुंबई आया था। झा साहब की मेज पर एक आमंत्रण पत्र देखा, जो प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा और एक संस्था की ओर से भी था। कार्यक्रम नेहरू प्लेनेटोरियम में था। मैंने उनसे अनुमति लेकर कार्ड देखा, उसमें विविध कार्यक्रम थे, नाटक व कवि-सम्मेलन भी। कवि सम्मेलन में आदरणीय श्री लीलाधर मंडलोई जी भी पधार रहे थे। जहाँ तक मुझे याद है उस समय वे प्रसार भारती के महानिदेशक थे। उनका नाम देखकर कार्यक्रम में जाने की उत्कंठा बढ़ गई। हालांकि उस समय मैं पनवेल में रहता था। फिर भी हिम्मत नहीं हारी और झा साहब से अनुरोध किया कि मैं भी कार्यक्रम में चलूंगा। खैर उनके साथ गया। कार्यालय कार्य के बाद झा साहब का व्यवहार बहुत मृदु और आत्मीय था। कार्यक्रम के बीच में चायपान के लिए कुछ समय के लिए प्रकाश हुआ तो आसपास बैठे लोग आपसी बातचीत में लग गए। मेरे पास दो महिलाएँ बैठी थीं। मैं उनसे बात करने लगा। उन्होंने बताया कि वे पाकिस्तान से आई है और वहाँ पर शिक्षक हैं। मैंने वहाँ शिक्षा और पाठ्यक्रम के बारे में पूछा तो वे दुखी होकर बोलीं कि जो भी पाठ्यक्रम है उसे पढ़ाना हमारा कर्तव्य है पर दिल छलनी हुआ जाता है। कुछ सेकंड चुप रहने के बाद बोलीं, वहाँ फिल-इन-द-ब्लैंक्स में बच्चों को सिखाया जाता है, भारत हमारा ------------- है, और बच्चे लिखते हैं दुशमन। उनकी आँखें डबडबा आईं। मेरी आँखें भी भर आईं। सिसकती सी आवाज में वे बोलीं यहाँ आकर हमने देखा है कि भारत का पाठ्यक्रम बहुत अच्छा है। फिर मुझसे पूछने लगीं, आपकी आवाज क्यों रुँध गई। मैंने कहा देश कोई हो पर बच्चों के कोमल हृदय पर ऐसी लकीर खींचना कितना पीड़ादायक है। वे बोलीं, हमें भी यही अफसोस है। भारत हमारा दुश्मन कतई नहीं है। उनकी आँखों में आाँसू देख पाता कि तभी प्रकाश बंद हो गया। और आगे का कार्यक्रम शुरू हो गया।
सत्येंद्र सिंह
दोनों देशों के बीच में संवाद होना चाहिए. आतंकवाद के चलते सब वहीं रूक जाता है.
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