बात उन दिनों की है जब मैं रेल सुरभि, मध्य रेल की गृह पत्रिका का चयनित सहायक संपादक के पद पर कार्यरत था। मेरी मुंहबोली बहन सुमन सरीन धर्मयुग (तत्कालीन प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका) में बतौर उप संपादक कार्यरत थी। वे लंच समय में टाइम्स भवन से मेरे पास महाप्रबंधक कार्यालय राजभाषा विभाग में लमच के लिए आती थीं। उनके साथ उनके कई साथी भी आते थे। उनके साथियों में कैलाश सैंगर का नाम विशेष उल्लेखनीय है, क्योंकि आगे चल कर उन दोनों का विवाह हुआ। उनके विवाह के समय तो मैं स्थानांतरित होकर जबलपुर चला गया था। लेकिन बात उससे पहले की है। उन दिनों मैं कल्याण में रहता था। सुमन बहन ने कहा कि वे अँधेरी में एक कवि सम्मेलन करने जा रहे हैं और उसमें मुझे उपस्थित ही रहना है, क्योंकि उसमें नीरज जी आ रहे हैं।। आग्रह टालने का तो प्रश्न था ही नहीं। मैं वीटी से कल्याण न जाकर सीधे अँधेरी के उस स्कूल के ग्राउंड में पहुँच गया, जहाँ कवि सम्मेलन का आयोजन था। पहुँचा तो सुमन और कैलाश जी उपस्थित थे। वैसे उपस्थिति बहुत कम थी। उन दोनों ने मुझसे कहा कि वे तो कवि सम्मेलन में व्यस्त रहेंगे, इसलिए मुझ...
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