कविता

 इस्तेमाल


आदमी को आदमी
इस्तेमाल कर रहा
तरह तरह के
रिश्ते बना कर
एक दूसरे को
ठग रहा।

भरोसा करने वालों का
हर रोज
भरोसा टूट रहा
भरोसा तोड़ने वाला
ऐश कर रहा।

सत्य की खोज
करने वाला
खोज करता रहा
झूठ अपने आप में
पलता रहा।

ओ दुनिया बनाने वाले
सब कुछ बना कर
तुझे क्या मिल रहा
आदमी को क्यों
इस तरह
परेशान कर रहा।

बता दे तू भला
अक्ल देकर क्यों
अक्ल हर रहा
आदमी को क्यों
सिखाया जाल बुनना
जो बुन कर
उसी में फँस रहा।

                    डॉ. सत्येंद्र सिंह
                      पुणे, महाराष्ट्र 

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