Posts

जीवन की आपाधापी

 जीना तो अपने हाथ में नहीं है। जीवन की डोर भी किसी के हाथ में है ऐसा लगता है। खैर जिस पर अपना वंश नहीं उस पर क्या सोचना। पर जो घटित होता है उसका प्रभाव तो मन पर पड़ता है। गुजरात में एक पुल आधे में टूटकर बह गया और कई वाहन उसमें गिर पड़े। यह मानव निर्मित है।     कल सोसायटी में पानी के कलेक्शन करना था। कुछ कहने लगे कि पानी तो आता ही नहीं कलेक्शन किस बात का। स्वयं जाकर देखा तो पानी अच्छा खासा आ रहा था।   लाइट के नए कुछ पोल लगे और एक महीने बाद उन्हें कनेक्ट किया गया तो जहां पोल लगने बाकी हैं वहां खलबली मच गई। ऐसा लगा कि सोसायटी दो हिस्सों में बंटी गई हो।       नई दिल्ली में एक रिश्तेदार की बेटी पहली मंजिल से गिर गई। सिर में चोट आई है। अभी तक होश नहीं आया। बच्ची की दादी मुझसे बोलती नहीं।      बड़े भाईसाहब का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है। भतीजे ने फोटो भेजा था। फोटो में तो अच्छे लग रहे थे।        जन्मदिन की शुभकामनाएं देनी हैं। विवाह वर्षगांठ की बधाई देनी हैं। फेसबुक पर रचनाएं पढ़नी हैं और कमेंट करना है।     वाट्सएप...

पाखंड के आयाम

  लघुकथा                    पाखंड के आयाम      मैं समुद्र के पास रहता था इसलिए रोज समुद्र के किनारे घूमने जाता। सुबह छ: बजे से सात बजे तक। काफी लोग सैर करते हुए दिखाई देते। कुछ परिचित और की अपरिचितों से परिचय हो जाया करता। गप शप और सैर एक साथ। इधर उधर की  भी मिल जाती।  सुबह किनारे सुबह हवा बहुत आनंद देती है, प्राणवायु जो ठहरी।      रेती के किनारे बड़े बड़े काले पत्थर हैं वहां और उन पर बैठ कर सुस्ताने वाले भी दिखते। कुछ जोड़े में भी रहते। हंसते खिलखिलाते। बड़ा अच्छा लगता।      एक दिन एक काले पत्थर पर नजर टिक गई। लगा कि मेरे अच्छे परिचित हैं परंतु वे ऊपर से नीचे एकदम काले कपड़े धारण किए हुए थे और चेहरा नीचे किए हुए।  मुझे संकोच हो रहा था कि नजदीक जाऊं या नहीं क्योंकि ऐसी वेषभूषा में कभी देखा नहीं था। कद काठी से वही परिचित से लग रहे थे। फिर भी संकोच वश मैं उनके नजदीक नहीं गया।      लेकिन सैर करते ...
  अभिव्यक्ति दोहे भाषण कथन उक्ति या हो व्याख्यान, सोच समझ बोलिए हे मनुज सुजान।१। बोली वाणी व्यक्ति की है वाकी पहचान, जैसे शब्द ऊचरै , बने दूजे कौ परिधान।२। भाव विचार व्यक्त करै सो ही व्यक्ति होय, सत्य न्याय स्पष्टता है अभिव्यक्ति सोय। ३। अधिकार समझ न बोलिए कोई कुविचार, निजता कलुषित होय अरु फैले अत्याचार।४। कर्तव्य अधिकार में, मान कें चले जो भेद, नागरिक कभी  न बन सके, पढ ले चारों वेद।५। अंतर कभी न कीजिए , राष्ट्र देश समाज , मानव को ना बांट सकें, धर्म पंथ व जात।६। विश्व बंधुत्व का भाव हिय में रखो संजोय, भारत देश की  एकता सदा अखंडित होय।७।                                डॉ सत्येंद्र सिंह                                  पुणे, महाराष्ट्र     ...

जल संकट

 पुणे में फरबरी 2025 में ही गर्मी इतनी पड़ रही है और आसपास के क्षेत्र में जल स्तर गिरता जा रहा है। घरों में जो पुणे महानगरपालिका का पानी आता है वह बहुत कम प्रैशर से आ रहा है। मैं अपनी सोसायटी का चेयरमैन हूँ और लोग मेरे पास पानी कम प्रैशर से आने की शिकायत करते हैं। मैं पानी सप्लाई करने वाले ऑपरेटर से बात करता हूँ। वह बताते हैं कि वे अपनी ओर से पूरा पानी खोलते हैं लेकिन प्रैशर कम क्यों है इसके लिए कुछ नहीं कर सकते।    हमारे क्षेत्र के समाज सेवक हैं प्रसाद जगताप जो पहले आंबेगांव खुर्द ग्रामपंचायत के सदस्य थे और अब नगर सेवक के उम्मीदवार हैं। उन्होंने हमारे क्षेत्र में पानी लाने, ड्रेनेज डलवाने और रोड बनवाने की दिशा में बहुत उल्लेखनीय कार्य किया है। इसलिए आज मैंने वाट्सएप पर प्रैशर कम आने के बारे में लिखा है। पुणे महानगरपालिका की ओर से वाट्सएप मोबाइल नंबर जारी किया है जिस पर सारी शिकायतें की जा सकती हैं।  ऐसे ही महाराष्ट्र राज्य बिजली बोर्ड ने भी ऐसा नंबर जारी किया है। मैं दोनों पर हिंदी में शिकायत दर्ज करता हूँ और उन पर कार्रवाई भी होती है।        लेक...
  लघुकथा                        परामर्श      समस्याएँ तो सबके जीवन में हैं बेटे, पर समस्या का समाधान भी उसीमें रहता है और इसको जो समझ लेता है वह कभी निराश नहीं होता, शिवशंकर जी अपने पुत्र को समझाते हुए कह रहे थे। पुत्र राम शंकर बड़े ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। तभी शिव शंकर जी के मोबाइल की घंटी बजने लगी। उन्होंने मोबाइल की ओर देखा, गांव से उनके एक मित्र का फोन था। हेलो कहते हुए उन्होंने उठाया। हाँ मैं रामधन बोल रहा हूँ। हालचाल पूछने के बाद बोले, "अरे यार क्या बताऊँ, वह जो छोटी बहू है, बहुत धमकी दे रही है कि वह कुछ ऐसा करेगी कि पूरा घर जेल में होगा। कभी छत पर चढ जाती है कभी दरवाजे पर खड़ी हो कर चिल्लाती है। समझ में नहीं आ रहा है, क्या करूँ? उसके पिता से कहा तो वह भी चुप लगा गए।"       शिव शंकर जी ने पूछा, "वह चाहती क्या है, यह पता किया?"       रामधन बोले, "वह चाहती है कि पूरी पैंशन के पैसे मैं घर में ...
  जिज्ञासा सवाल पूछने का भी कोई अधिकार होता है या जिज्ञासा होती है, आजकल यह भी सवाल बन गया है क्योंकि सवाल पूछने के लिए जिम्मेदार लोग पहले उनका हित देखते हैं जिनसे सवाल पूछना है और जिनके लिए सच में सवाल पूछना है वे उनकी सोच में थे या हैं, पता नहीं। सत्य को सब जानना चाहते हैं पाना चाहते हैं जीना चाहते हैं पर सत्य को दबाकर। सत्य को पाने के लिए सबसे पहले वरणीय है जिज्ञासा आप्त वचन है ब्रह्म ही सत्य है इसलिए आवश्यक है ब्रह्म जिज्ञासा पर प्रश्न पूछने की जिज्ञासा मर रही है ऐसा लगता है । बिना प्रश्न के जिज्ञासा का अस्तित्व क्या है जब प्रश्न करना संकोच बनता है भय का जन्म करता है और जिज्ञासा तिरोहित प्रतीत होती है तब जीवन मरता है परंतु सजीव हो उठती है जिज्ञासा दिलों के अंदर और विस्फोट बन जाती है चेहरों पर चिपक जाती है। उत्तर के उत्तरदाई निष्प्रभ हो जाते हैं इसलिए जिज्ञासा मर नहीं सकती न उसे मरने देना चाहिए जैसे आग को राख दबा सकती है खत्म नहीं कर सकती जिज्ञासा को दबा सकते हैं पर खत्म नहीं कर सकते।         ...

लघुकथा

  लघुकथा                         उसूल               माधव और रघु दोनों बचपन से मित्र हैं। दोनों अपने अपने काम में माहिर। दोनों साथ साथ पढे। माधव ने आईटीआई कर लिया और रघु ने प्लंबिंग का काम सीख लिया। दोनों की पारिवारिक परिस्थितियों ने उच्च शिक्षा ग्रहण न करने दी परंतु दोनों मेहनती थे और अपनी मेहनत की कमाई से खुश भी। दोनों का विवाह हो गया तो गांव से मुंबई आ गए।       माधव ने मेकेनिकल इंजीनियरिंग में आईटीआई किया था सो उसे काम मिलने में दिक्कत नहीं हुई। रघु को शुरू में काम तलाशने में थोड़ी परेशानी तो हुई लेकिन प्लम्बिंग में होशियार होने के कारण जहाँ काम करता वहाँ पसंद किया जाता और जिन-जिनके यहाँ काम करता वे लोग जरूरत पड़ने पर उसी को बुलाते और अपने मित्रो के यहाँ भी भेजते। इस प्रकार रघु की आमदनी भी ठीक ठाक थी। दोनों अपने अपने परिवार के साथ कल्याण में एक ही  बिल्डिंग में रहते थे । ...