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भ्रष्टाचार मुक्ति

                              हर वर्ष भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की कसमें खाई जाती हैं, संकल्प किए जाते हैं, कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है पर भ्रष्टाचार है कि न जाने का नाम लेता है और न व्यक्ति को, भारत को, संसार को मुक्त करता है। यही नहीं नए-नए रूपों में देश में, प्रदेश में, समाज में प्रवेश करता रहता है। वैसे देखा जाए तो देश, प्रदेश व समाज तो जड़ हैं और जड़ता में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार की क्या औकात है? जो कुछ होता है चेतन में होता है, जो कुछ करता है वह चेतन करता है। पता नहीं व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार न करने, न सहने की कसम खाता है या नहीं। सामूहिक रूप से अवश्य कसम खाता है। व्यक्तिगत रूप से कसम खा ले तो भ्रष्टाचार रहेगा कहाँ?       व्यक्ति के मन में, सोच में ही सब कुछ रहता है और जब वह कार्यरूप में परिणत होता है तब दिखाई देता है कि कुछ हुआ। भ्रष्टाचार एक व्यक्ति करता है, दूसरा सहता है, तीसरा दुखी होता है और चौथा कसम खाता है। यह कैसी विडम्बना है। लेकिन...