चिंता
किसान परिवार पूरा, मेहनत करता जाए,
न लागत मिलती न मेहनत का फल पाए।
खेत और बागान से, सबका भरता है पेट,
पैसे वाले के पेट भरे, किसान का खाली पेट।
सीताफल अमरूद सड़ रहा देखे सारा देश,
कृषक उजाड़े बाग़ सब, बाँध खाली पेट।
सबको चिंता व्यापती केवल शब्दन माँहि,
घर में खावें चूपडी बाहर फिकर जताहिं।
आटा रुपए पचास का, मिलता बीच बजार,
भाजी पाला कीट संग, दालें बिकें हैं सौ पार।
शंकर राम घनश्याम तुम दीनों के हो करतार,
किरपा कर पेट भर दीजिए सबके पालनहार।
सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र
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