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अठखेलियाँ

 जीवन अपने आप से ही अठखेलियाँ खेलता है। पचास साल के वैवाहिक जीवन में पत्नी जी पहली बार बीमार ही नहीं हुई अस्पताल में भर्ती भी हो गई। मानो तूफान आ गया। मैं तीस पैंतीस साल से डायबिटीज, स्पांडलाइटिस व अवसाद से जूझ रहा हूँ पर कोई बीमार ही नहीं मानता। पत्नी जी बीमार हुईं तो मुझे भी लगा कि मैं वास्तव में दोगुना बीमार हो गया पर साथ ही उनकी सेवादारी में अपनी बीमारी भूल ही गया। एक अनजाने भय से ग्रस्त हो गया कि पत्नी जी चली गई तो मेरा क्या होगा। अचानक ही आसमान की ओर हाथ उठ जाते हैं कि हे पालनहारे ऐसा न करना। जोड़ी बिछड़े न। विदा हो तो एक साथ। सत्येंद्र सिंह

आऊंगा

 आऊंगा  तुम्हारे पास  अवश्य/स्वप्न में सही  पर आऊंगा अवश्य। मानलो  किसी कारणवश मैं नहीं आ पाया तो तुम्हीं चले आना  जागते में सोते में  स्वप्न में पर आना। सत्येंद्र सिंह

झरोखे (२)

 पुलिस रिपोर्ट में उसका नाम भी था। उसे पता चला। लेकिन वह घबराया नहीं, क्योंकि उसने कुछ गलत किया ही नहीं था। प्रभारी एक महिला थी। उसका मुँह कुछ टेढ़ा था और एक आँख छोटी थी। कानी तो नहीं थी पर लगती कानी थी। वह किसी का न तो अच्छा कर सकती थी और न अच्छा देख सकती थी। बॉस तेज तर्रार था सो उससे डरती ही नहीं घबराती भी थी। लेकिन जब सुशीला के पिता ने बॉस के विरुद्ध पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी तबसे वह समाज सेविका और निर्भीक शेरनी बन गई थी। सुशीला की हमदर्द बन गई और उसे सामने रखकर सभी महिलाओं को एकत्र कर लंच समय में ऑफिस के चारों ओर जुलूस निकालती। एक दिन उससे बोली कि तुम्हें पुलिस इंस्पेक्टर नगरकर ढूंढ रहा था। उसने घूरा ढूंढ रहा था तो उसने आँख मिचकाली। वह इंस्पेक्टर के पास पहुँचा।  अपना परिचय दिया तो इंस्पेक्टर ने बड़े सम्मान से बिठाया और पूछा कि क्या मामला था तो उसने बताया कुछ नहीं। इंस्पेक्टर ने हँस कर कहा, यह हम भी जानते हैं कि यहाँ ऐसा कोई कमरा नहीं कि किसी पोस्टग्रेजुएट लड़की को खींचकर ले जाया जा सके। ऐसी झूठी और बेबुनियाद की रिपोर्ट हमारे पास बहुत आती हैं। इंस्पेक्टर ने उसस...

दुश्मन भारत

  यह पोस्ट लिखना नहीं चाहता था परंतु 13-14 साल हो गए हृदय को मथे डाल रही है। 2006-07 में झाँसी से स्थानांतरित होकर मुंबई आया था। झा साहब की मेज पर एक आमंत्रण पत्र देखा, जो प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा और एक संस्था की ओर से भी था। कार्यक्रम नेहरू प्लेनेटोरियम में था। मैंने उनसे अनुमति लेकर कार्ड देखा, उसमें विविध कार्यक्रम थे, नाटक व कवि-सम्मेलन भी। कवि सम्मेलन में आदरणीय श्री लीलाधर मंडलोई जी भी पधार रहे थे। जहाँ तक मुझे याद है उस समय वे प्रसार भारती के महानिदेशक थे। उनका नाम देखकर कार्यक्रम में जाने की उत्कंठा बढ़ गई। हालांकि उस समय मैं पनवेल में रहता था। फिर भी हिम्मत नहीं हारी और झा साहब से अनुरोध किया कि मैं भी कार्यक्रम में चलूंगा। खैर उनके साथ गया। कार्यालय कार्य के बाद झा साहब का व्यवहार बहुत मृदु और आत्मीय था। कार्यक्रम के बीच में चायपान के लिए कुछ समय के लिए प्रकाश हुआ तो आसपास बैठे लोग आपसी बातचीत में लग गए। मेरे पास दो महिलाएँ बैठी थीं। मैं उनसे बात करने लगा। उन्होंने बताया कि वे पाकिस्तान से आई है और वहाँ पर शिक्षक हैं। मैंने वहाँ शिक्षा और पाठ्यक्रम के बारे में पूछा ...

झरोखे ,,(१)

 वर्ष 1985 की अप्रैल की एक तारीख, मुंबई वीटी के पास कचहरी की कैंटीन, लंच का समय, वह अपने बॉस के सामने बैठा कोल्डड्रिंक पी रहा था। वे कह रहे थे कि वो सा...चाहती है कि आज ही उससे शादी कर लूँ, जबकि वह आज ही अपने भाई के लिए लड़की देखने पंजाब मेल से आगरा जा रही है। थोड़ी देर बाद वह आ गई। बहुत तनाव में थी। बॉस ने उसके सामने एक फार्म रखा और उससे कहा कि उस फार्म में विटनेस की जगह हस्ताक्षर कर दे।  फार्म कोर्ट मैरिज का था। फार्म एकदम रिक्त था। उसने कहा कि इसमें कोई नाम ही नहीं है तो विटनेस किसका। तो उन्होंने सभी कॉलम भर दिए । उसके हस्ताक्षर वाला फार्म लेकर वह चली गई। लंच समय समाप्त हो गया था और वह ऑफिस में आ गया। करीब एक महीने बाद पता चला कि बॉस के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट पुलिस में लिखवाई गई है, जिसमें उसका नाम भी था। मैं सोचता रहा कि उसका नाम क्यों? और बलात्कार।

पं. रामकिंकर उपाध्याय -२

 पंडित रामकिंकर उपाध्याय जी पूछा कि मैं अपने आपको जानना चाहता हूँ, मेरा जन्म क्यों हुआ? इसी रूप में क्यों हुआ? और जीवन का उद्देश्य क्या है? वे सुनकर गंभीर हो गए। कुछ देर मौन रहकर बोले, इस सबके लिए साधना करनी पड़ेगी। मैंने कहा कि मैं प्रस्तुत हूँ, मैंने हाई स्कूल पास कर लिया है, उम्र भी कोई ज्यादा नहीं है और न कोई जिम्मेदारी है मेरे ऊपर इसलिए मैं साधना कर सकता हूँ। वे मौन हो गए और बोले इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे। हम दोनों पैदल जन्मभूमि के लिए चल दिए। मेरे पास साइकिल थी पर उनके साथ रहते हुए साइकिल पर कैसे बैठ सकता था। यह बात करीब 1969-70 की होगी। पंडित जी प्रवचन करके चले गए और मैं उदरपूर्ति के लिए भरतपुर चला गया। फिर पंडित जी से मुलाकात तो हुई पर बात करने का अवसर नहीं मिला। और वे प्रश्न आज भी मेरे जेह्न में हैं। सत्येंद्र सिंह

पं.रामकिंकर उपाध्याय

 पं. रामकिंकर उपाध्याय, मानस मार्तंड, रामायण व रामचरित मानस के लब्धप्रसिद्ध प्रवचनकार, श्रीकृष्ण-जन्मस्थान-सेवासंघ के अनुरोध पर श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में प्रवचन करने आते थे। कभी एक सप्ताह के लिए तो कभी दो सप्ताह के लिए, परंतु उनकी विशेषता यह थी कि पूरे समय एक ही पात्र पर प्रवचन करते थे जैसे हनुमान जी, प्रभु रामचंद्र, सीता जी, एक सप्ताह या दो सप्ताह एक ही पात्र पर बोलते थे और वेद, उपनिषद, पुराण आदि से उद्धरण दिया करते। सुनने वाले अभिभूत सुनते रहते। उनसे अच्छा रामायण प्रवचनकार मैंने अपने जीवन में नहीं देखा न सुना। करपात्री जी का नाम सुना था परंतु उनके प्रवचन सुनने का कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। उपाध्याय जी को सुनने का सौभाग्य भी इसलिए मिल सका क्योंकि मैं उदरपूर्ति के श्रीकृष्ण-जन्मस्थान-सेवासंघ में बतौर टंकक लिपिक काम करता था। एक बार ऐसा हुआ कि मैं आर अम एस में डाक डालकर जन्मभूमि लौट रहा था कि पं उपाध्याय जी बाज़ार में टहलते हुए मिल गए। वे प्रवचन के लिए पूजा करने से पहले एक दो घंटे अकेले टहलते थे। मैंने उनके सामने साइकिल रोकी, साइकिल से उतरा और उनसे कहा कि पंडित जी आपसे कुछ बात...