यादों के झरोखे से

 

यादों के झरोखे से
               मेरी हिंदी सेवा और मेरी यादें
                                           

      मैं उन दिनों "रेल सुरभि" का उप संपादक था। मध्य रेल पर संघ लोक सेवा आयोग से चयनित प्रथम हिंदी अधिकारी डॉ विजय कुमार मल्होत्रा (पूर्व निदेशक राजभाषा रेलवे बोर्ड) थे। उन्होंने ही "रेल सुरभि" पत्रिका की शुरुआत की। योजना बनाने के लिए कार्यालय समय के बाद वी टी केफेटेरिया में, जो बुकिंग कार्यालय के ऊपर दूसरे मआलए पर रिटायरिंग रूम के पास था, बैठक हुआ करती। बैठक में मल्होत्रा साहब के साथ तत्कालीन मुख्य सतर्कता निरीक्षक आई.एन. आर्य के अलावा हिंदी विभाग के राम शंकर चौधरी, वीणा टंडन (बाद में पृथी), रानी भाटिया (सीमा आसवानी), आर.डी.चौहान और आशा मिश्रा रहती। ऐसे ही किसी बैठक में पत्रिका का नाम "रेल सुरभि" रखा गया। प्रथम अंक भी प्रकाशित हुआ जिसके संपादक स्वयं विजय कुमार मल्होत्रा जी थे। इसके बाद वे सिकंदराबाद चले गए और उनके स्थान पर बलराज सिंह सिरोही आए। सिरोही जी भी संघ लोकसेवा आयोग से चयनित प्रथम श्रेणी हिंदी अधिकारी थे। वास्तव में उक्त दोनों अधिकारी संघ लोकसेवा आयोग से चयनित प्रथम पैनल के अधिकारी थे और मध्य रेल को दोनों की सेवाएं प्राप्त होने का गौरव प्राप्त है।
       सिरोही जी ने "रेल सुरभि" के पुनर्प्रकाशन की योजना पुनः बनाई। उसके लिए राजभाषा सहायक ग्रेड-1 का एक पद संवर्ग बाह्य करके उप संपादक का पद बनाया। राम शंकर चौधरी "चकल्लस" संस्था से जुड़े हुए थे और चकल्लस पत्रिका के संपादन प्रकाशन का उन्हें अच्छा अनुभव था। चकल्लस संस्था सुप्रसिद्ध लेखक रामावतार चेतन चलाते थे जो सुप्रसिद्ध लेखक व पत्रकार कन्हैया लाल नंदन की पत्नी के भाई  थे। चौधरी जी का इन दोनों साहित्यकारों के अलावा और भी बड़े बड़े साहित्यकारों से परिचय था।  मैं भी पत्रकारिता की उपाधि प्राप्त था परंतु उप संपादक के पद पर श्रीमती सावित्री अग्रवाल का चयन हुआ।  एक डेड वर्ष के बाद दुबारा मेरा चयन हुआ। परंतु चौधरी जी "रेल सुरभि" से बतौर लेखक तहेदिल से जुड़े रहे क्योंकि पत्रिका प्रकाशन का सपना उनका भी था।  उनके अलावा आई.एन.आर्य सतर्कता विभाग में रहते हुए भी लेखक के तौर पर जुड़े रहे। उनके अलावा आदरणीय रवीन्द्र नाथ मिश्र (सेनि वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी), विश्व नाथ मिश्र (थे तो वे भायखला अस्पताल में चीफ फार्मासिस्ट पर हिंदी के लेखक बड़े थे। सबसे ज्यादा उनके उपन्यास, कहानी संग्रह आदि प्रकाशित हो चुके थे) "रेल सुरभि" के नियमित लेखक थे। इनकी रचनाओं के साथ साथ तत्कालीन निदेशक राजभाषा शिवसागर मिश्र, व अन्य विभागाध्यक्षों के आलेख व साक्षात्कार प्रकाशित करने का मुझे गौरवपूर्ण अवसर मिला।
     और, इसी के साथ हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों, जिनमें रमानाथ अवस्थी, कन्हैयालाल नंदन, बेधड़क बनारसी, हीरा लाल चौबे आदि से भी संपर्क रहा। उनकी रचनाएं और साक्षात्कार प्रकाशित करने का अवसर भी मिला।  बेधड़क बनारसी जी से तो एक रिश्ता सा बन गया था।  वे हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के साथ साथ बहुत बड़े कवि थे। हास्य कवि पर गंभीर। चकल्लस द्वारा वर्ष में एक बार हास्य कवि सम्मेलन होता था। उसमें काफी लब्धप्रसिद्ध हास्य कवि व व्यंग्यकार  आते थे। राम शंकर चौधरी जी के कारण चकल्लस के कार्यक्रम देखने  सुनने का अवसर तो मिल ही जाता था। एक कार्यक्रम मेें बेधड़क बनारसी जी भी आए। मैं उनसे मिलने विश्राम गृह आया तो उन्होंने मुझे घर नहीं जाने दिया, अपने साथ ही रोक लिया।  रात में भोजन करने उनके साथ ही होटल  में गया।  वहां शरद जोशी, माणिक वर्मा जी भी थे, एक और कवि थे जिनका नाम याद नहीं आ रहा।  उनके दर्शन करके मैं निहाल हो गया। बेधड़क बनारसी जी का पूरा नाम  काशीनाथ उपाध्याय "भ्रमर" बेधड़क बनारसी एम.ए.बी.टी. था। बोरीवली निवासी मेरे मित्र अशोक त्रिपाठी बेधड़क जी के छोटे भाई थे । अशोक त्रिपाठी मेरे भाईसाहब को किसी वजह से अपना बहनोई मानते थे और मुझे अपने बहनोई का अनुज और उन्हीं के कारण बेधड़क जी उसी रिश्ते से मुझे भी देखते समझते थे। उन्होंने कभी भी मुझे यह एहसास नहीं होने दिया कि वे रेलवे हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य थे और मैं एक रेल कर्मचारी। वे जब भी मुंबई आते मुझे सूचना देते और मिलने के लिए बुलाते।  एक बार किसी कवि सम्मेलन में आए थे और बोरीवली से लोकल से निकले तो वापस बोरीवली नहीं पहुंच पाए।  त्रिपाठी जी से ही पता चला कि लोकल में उनका शव दो दिन बाद पाया गया। उन्हें क्या हुआ, कुछ नहीं मालूम। आज अचानक इंटरनेट पर कविता कोश में उनका नाम देखा तो उनकी बहुत याद आई और उन्हें भूलने के मेरे सारे प्रयास विफल हो गए। आज आई.एन.आर्य, रामशंकर चौधरी, वीणा पृथी, आर.डी.चौहान, आशा मिश्रा इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी यादें मेरे मानस पटल पर जीवित हैं।
             
                 
                    पुणे महाराष्ट्र

Comments

Popular posts from this blog

लघुकथा

अठखेलियाँ