बेठे ठाले
आजकल सबसे वाट्सएप पर ही बातचीत होती है। फोन पर भी कम हो गई हैं। पड़ोसी से कुछ कहना हो तो मैसेज, नौकरी पेशा पति पत्नी वाट्सएप पर मैसेज डाल कर निकल जाते हैं। लेकिन इसमें महामारी के कारण व्यवधान आ गया है। जिस तरीके से वाट्सएप फेसबुक पर संदेश मिलते हैं, उससे ऐसा लगता है कि हर व्यक्ति दूसरे के लिए परेशान है। जैसे अपनी तो कोई चिंता ही नहीं। अखबार में कोई समाचार देखा झट से कटिंग वाट्सएप ग्रुप पर, फेसबुक पर उपलब्ध और व्यक्तिगत रूप से भी मोबाइल पर। कहीं से कोई नुस्खा मिल गया, तो तुरंत वाट्सएप पर। और तो और अपने धर्म, अपने समाज के पक्ष में और दूसररे के विरुद्ध कोई मैसेज हो तो बिना उसकी सच्चाई जाने तो दनादन फारवर्डिंग। जल्दी से जल्दी वाट्सएप पर जैसे वे ज्ञान नहीं देंगे तो सब अज्ञानी रह जाएंगे और लोगों का बहुत नुकसान हो जाएगा। मेरे एक मित्र हैं राम कृष्ण भडभडे। वे इस काम में बहुत माहिर हैं और उनका अधिकांश समय इसी कार्य में बीत जाता है। कोई उनसे पूछता है कि भडभडे साहब आप इतनी मेहनत करके मैसेज डालते हैं कोई उन्हें पढ़ता भी है। वे बड़े गर्व से कहते हैं, भाई मैं तो अपना कर्तव्य करता हूं।
इस महामारी में किसके साथ क्या हो जाए कोई भरोसा नहीं। इसलिए आपस में बात करते रहना और एक दूसरे के हालचाल लेते रहना अच्छा लगता है। अपने रिश्तेदारों व मित्रों को सकुशल जानकर बड़ा संतोष अनुभव होता है। पर भडभडे साहब की बात निराली है। फोन करो तो पता चलेगा कि अखबारों की कटिंग काट रहे हैं वाट्सएप के लिए। कोई कहता है कि अखबार सभी पढ़ते हैं और सभी को सारी बातें पता होती हैं, फिर आप क्यों कटिंग काटते रहते हैं तो उनका उत्तर होता है कि सभी लोग एक एक अखबार ही पढ़ते हैं, सारे अखबार थोड़े ही पढ़ते हैं। मैं तो जो अखबार आता है उसके ऑनलाइन उपलब्ध सभी अखबारों को पढ़ता हूं और जरूरी क्रॉप करके, न्यूज सेव करके सभी की जानकारी के लिए भेज देता हूं। सभी कहते हैं कि दूरदर्शन पर दिन भर न्यूज आती रहती है। सभी लोग जागरूक हैं और आजकल तो अधिकतर घर में रहते हैं तो समाचार सुनते रहते हैं, फिर क्यों आप ... वे तुन्ना जाते हैं, टीवी चैनल एक ही न्यूज को दिन भर दिखाते रहते हैं। उससे तो बोरियत हो जाती है।
एक बार पूरे दिन उनका फोन नहीं आया। न ही वाट्सएप पर मैसेज। सभी को थोड़ी चिंता हुई। शाम के समय कई मित्रों ने फोन किया। वे उठाते और थोड़ा खांसते से बोलते कि कबसे आपके फोन की राह देख रहा था। कोई पूछता, क्या बात है, सब कुशल है न। अंदर से खुश और बाहर से दुख सा प्रकट करते बोलते खांसी आ रही है, थोड़ा सिर में भी दर्द सा है। कोई कहता कि इसमें बड़ी बात क्या है, ऐसा तो होता रहता है तो अंदर से उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे चाहते थे कि उनकी तबीयत को बहुत गंभीरता से लिया जाए तथा सभी दुखी हों। किसी ने कहा कि आप तो बहुत सारे नुस्खे जानते हैं, आपके नुस्खों से लाभ उठा कर ऐसी छोटी मोटी शिकायत हम दूर करते रहते हैं। आप उन्हीं में से कोई नुस्खा अपनाइए, ठीक हो जाएंगे। सच तो यह है कि उन्होंने किसी नुस्खे को अाजमाया ही नहीं था। वे यह तो बोल नहीं सकते कि नुस्खे तो अखबार से, मित्रों की पोस्ट से लेकर भेजा करते थे । स्वयं इस्तेमाल करने का उनका उद्देश्य भी नहीं रहा। और कभी आजमाया भी नहीं क्योंकि आजमाने में डर भी लगता था। उन्हींके जैसे स्वभाव वाले किसी मित्र ने पूछा कि घर से बाहर निकले थे। थोड़ी चुप्पी के बाद बोले कि हां गया तो था, एक तो यह देखने कि लोग कोरोना से बचाव के नियमों और शासन के आदेशों का कितना पालन कर रहे हैं और घूम ही रहा था कि एक मित्र ने आवाज देकर घर में बुला लिया। उसकी शादी की सालगिरह थी। एक मिठाई का पीस, चाय नमकीन लिया और शुभकामनाएं देकर निकल आया। मित्र ने पूछा कि कहीं फ्रिज का पानी तो नहीं पी लिया। कुछ याद करते से बोले हां पानी तो ठंडा था। तो फिर, सबको उपदेश देते हैं और खुद परहेज़ नहीं करते, मित्र को सुनाने का अवसर मिल गया था। उनके वाट्सएप ग्रुप के सारे मित्र उन्हें कोई न कोई सुझाव देते रहे, कुछ डाराते रहे तो कुछ हिदायतें देते रहे। दो दिन में वे स्वयं पक गए और समझ गए कि वाट्सएप मैसेज संबंधी नीति और आदेश एकदम उचित हैं। तीन चार दिन बाद वाट्सएप पर उनका केवल गुड मार्निंग का मैसेज देखा तो सब समझ गए कि भडभडे साहब की तबीयत ठीक हो गई।
ऐसे ही और भी मित्र हैं जो बस दूसरों को समझाने में लगे हैं पर खुद नहीं समझते। कई लोग बिना काम के ऐसे ही बाजार में घूमने जाते हैं, यह देखने कि कैसा माहौल चल रहा है। पता नहीं क्या जानना चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी, सांसद, विधायक, आयुक्त साहब, महापौर साहब कलेक्टर साहब सभी कहते हैं कि शासन प्रशासन, डॉक्टर,नर्स, सेना, आपदा प्रबंधन, पुलिस, सभी स्वास्थ्य कर्मी, सफाई कर्मी, बिजली वाले, डाकखाने वाले, जन प्रतिनिधि, एनजीओ, समाज सेवक, पत्रकार, मीडिया कर्मी सभी आपके लिए अपनी जान हथेली पर रखकर अपने परिवार को भूलकर आपके लिए ही काम कर रहे हैं। आप केवल उनकी बात मानें, बिना आवश्यक काम के घर से बाहर न निकलें, मॉस्क पहनें, हाथ धोते रहें और तीन फीट की दूरी रख कर ही किसी से बात करें। कल ही तो प्रधानमंत्री जी ने कहा कि हर एक को अपना ध्यान रखना होगा।
हमारे एक मित्र अक्सर कहते रहते हैं कि भाई सब जन विवेकानंद मत बनो। कुछ बनना है तो उनके जैसा बनने का प्रयास करो। शासन, प्रशासन, डॉक्टरों और अपने बड़ों की बात मानें। कोई बाहर का काम नहीं है तो अपने बीबी बच्चों के साथ घर में रहें। अपना और अपने परिवार का ध्यान रखें। यही समय की मांग है। अपना चित्त शांत बनाए रखें और ऐसा कुछ भी न करें जिससे किसी दूसरे का चित्त अशांत हो। बैठे ठाले घर में भी बहुत कुछ कर सकते हैं। माता पिता, भाई बहन, पत्नी व बच्चों के हँसी खुशी समय बिताएं। बच्चों की किलकारियां सुनें। ऐसे ही यह समय भी गुजर जाएगा। माना कि मानवीय स्वभाव है कि अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को अभिव्यक्त करना, परंतु उसमें क्या उपयोगी या अनुपयोगी है इसका निर्णय करने के लिए विवेक बुद्धि भी मानव को प्रकृति प्रदत्त है।
सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र
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