कविता - स्त्रियाँ

 स्त्रियाँ


क्यों हर बार दांव पर लगी होती हैं

सत्ता दंभ बेअदबी की शिकार होती हैं

झूठी शान और जीत के नाम पर

उनका शरीर, मन और आत्मा

क्यों हमेशा कुर्बान होती हैं।


पैदा होते ही दफन करना

जिए तो सजना संवरना रोकना

घूंघट में चेहरा छिपा रखना

बालपन में विवाह करना

उनकी इच्छाओं की बलि देना

विधवा हो तो जीने न देना

पति हार जाए तो जौहर करना

विरोधी जीत जाए तो

उसकी हवश का शिकार होना

क्यों उन पर ही लागू होता है।


सोचते समझते थे हम सब 

ये इतिहास की बातें हैं

पर स्त्रियां आज भी वैसी ही हैं

समाज के नाम पर

देश के नाम पर 

सत्ता के नाम पर 

जीत के नाम पर

और धर्म के नाम पर

स्त्रियां आज भी कुर्बान हैं

देख लो यह तालिबान है।


इसीलिए अब लोग सिद्ध कर रहे हैं

स्त्रियों को दबाए रखने की रीतियां

कि क्यों होता था बाल विवाह

क्यों होता था जौहर

क्यों जलाते थे चिता पर जिंदा

क्योंकि उनकी इज्जत की फिक्र थी।


आदमी को जन्म देने वाली

समाज को रचाने वाली

देश को चलाने वाली

धर्म को बनाने वाली

स्त्रियां कब तक जलेंगी

कब तक मरती रहेंगी

स्त्रियां कब तक 

कुर्बानी देती रहेगी।


                     सत्येंद्र सिंह,

                    पुणे, महाराष्ट्र


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