अतीत के झरोखे से
मैं 1981 में मध्य रेल मुख्यालय मुंबई वीटी अब छशिट आया झाँसी से ट्रांसफर हो कर। ज्यादातर रहने के खोली कल्याण व उसके आसपास ही मिलती थी। पदस्थापना मुंबई मंडल पर हुई, जहाँ उषा राजपूत से मुलाकात हुई। वह मथुरा की है इसलिए उसके जरिए कल्याण में कमरा मिल गया। अब कल्याण से वीटी अर्थात सीएसटीएम तक आने जाने का सिलसिला लोकल से शुरू हो गया। कल्याण से वीटी तक जो लोकल चलती थीं वे ठाणे तक स्लो थी और सुबह आठ बजे छूटती थी। इसलिए मैं कसारा या कर्जत से आने वाली फास्ट लोकल पकड़ता था। एक दिन कर्जत लोकल में मैंने शुक्ला जी को ताश खेलते देखा। शुक्ला जी का पूरा नाम जयकरण शुक्ल था और वे बहुत अच्छे अनुवादक थे। मुझसे बड़ प्रेम करते थे। तो उनके डब्बे में घुसकर उनके पास पहुँचने की कोशिश करता और वे मुझे या उनके मित्र बीच यात्रा में बैठने के जगह दे देते थे। एक घंटे खडे़ खड़े यात्रा करने में दस मिनट का बैठना इतना राहत देता कि कहते नहीं बनता।
दो चार दिन बाद, एक बार अचानक ऐसा हुआ कि मैं लोकल के डब्बे में जैसे ही चढ़ा और गाड़ी खिसकी तो किसी ने पीछे से मेरे सिर पर जोर से चपत लगाई और देखने के लिए जैसे ही घूमा तो दूसरी तरफ से घूंसा पड़ा। इस तरह तीन चार चपत घूंसे लग गए तो जोर से चिल्ला पड़ा "शुक्ला जी" उन्होंने भी जोर से कहा कि आ जाओ, अरे भाई आने दो, तो मुझे उनके पास पहुंचने तक मार्ग दे दिया गया। इसके बाद मार तो नहीं पड़ी पर डब्बे में घुसते ही जोर से बोलता, "शुक्ला जी नमस्कार", वे बोलते "आ जाओ" और इस तरह 1985 तक का समय कट गया। जयकरण शुक्ल जी आज नहीं है ंंमैं भी सेवानिवृत्त हो चुका हूँ, पर उनकी याद बहुत आती है।
सत्येंद्र सिंह।
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