लघुकथा, महोदय


                        महोदय

वे आए, इधर उधर देखा। दीवारों, छत को घूरा। हूँ की एक हुंकार भरी।  घर वाले अवाक्, कुछ सोचने समझने से परे किंकर्तव्यविमूढ़।   ओ गुड, गुड, की आवाज सुन कर पहले चौंके, फिर कुछ आश्वस्त हुए और चेत आने पर महोदय को सहर्ष संबोधित करने लगे - आइए सर, खाने की मेज इधर है। और घर मालिक आगे रास्ता बताते और शेष उनके पीछे चलने लगे। महोदय ने पीछे वालों पर एक नज़र मारकर आश्वस्ति की लंबी सांस भरी।  

  सत्येंद्र सिंह

Comments

Popular posts from this blog

लघुकथा

रेल अस्पताल और इलाज़