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Showing posts from July, 2025

जीवन की आपाधापी

 जीना तो अपने हाथ में नहीं है। जीवन की डोर भी किसी के हाथ में है ऐसा लगता है। खैर जिस पर अपना वंश नहीं उस पर क्या सोचना। पर जो घटित होता है उसका प्रभाव तो मन पर पड़ता है। गुजरात में एक पुल आधे में टूटकर बह गया और कई वाहन उसमें गिर पड़े। यह मानव निर्मित है।     कल सोसायटी में पानी के कलेक्शन करना था। कुछ कहने लगे कि पानी तो आता ही नहीं कलेक्शन किस बात का। स्वयं जाकर देखा तो पानी अच्छा खासा आ रहा था।   लाइट के नए कुछ पोल लगे और एक महीने बाद उन्हें कनेक्ट किया गया तो जहां पोल लगने बाकी हैं वहां खलबली मच गई। ऐसा लगा कि सोसायटी दो हिस्सों में बंटी गई हो।       नई दिल्ली में एक रिश्तेदार की बेटी पहली मंजिल से गिर गई। सिर में चोट आई है। अभी तक होश नहीं आया। बच्ची की दादी मुझसे बोलती नहीं।      बड़े भाईसाहब का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है। भतीजे ने फोटो भेजा था। फोटो में तो अच्छे लग रहे थे।        जन्मदिन की शुभकामनाएं देनी हैं। विवाह वर्षगांठ की बधाई देनी हैं। फेसबुक पर रचनाएं पढ़नी हैं और कमेंट करना है।     वाट्सएप...

पाखंड के आयाम

  लघुकथा                    पाखंड के आयाम      मैं समुद्र के पास रहता था इसलिए रोज समुद्र के किनारे घूमने जाता। सुबह छ: बजे से सात बजे तक। काफी लोग सैर करते हुए दिखाई देते। कुछ परिचित और की अपरिचितों से परिचय हो जाया करता। गप शप और सैर एक साथ। इधर उधर की  भी मिल जाती।  सुबह किनारे सुबह हवा बहुत आनंद देती है, प्राणवायु जो ठहरी।      रेती के किनारे बड़े बड़े काले पत्थर हैं वहां और उन पर बैठ कर सुस्ताने वाले भी दिखते। कुछ जोड़े में भी रहते। हंसते खिलखिलाते। बड़ा अच्छा लगता।      एक दिन एक काले पत्थर पर नजर टिक गई। लगा कि मेरे अच्छे परिचित हैं परंतु वे ऊपर से नीचे एकदम काले कपड़े धारण किए हुए थे और चेहरा नीचे किए हुए।  मुझे संकोच हो रहा था कि नजदीक जाऊं या नहीं क्योंकि ऐसी वेषभूषा में कभी देखा नहीं था। कद काठी से वही परिचित से लग रहे थे। फिर भी संकोच वश मैं उनके नजदीक नहीं गया।      लेकिन सैर करते ...
  अभिव्यक्ति दोहे भाषण कथन उक्ति या हो व्याख्यान, सोच समझ बोलिए हे मनुज सुजान।१। बोली वाणी व्यक्ति की है वाकी पहचान, जैसे शब्द ऊचरै , बने दूजे कौ परिधान।२। भाव विचार व्यक्त करै सो ही व्यक्ति होय, सत्य न्याय स्पष्टता है अभिव्यक्ति सोय। ३। अधिकार समझ न बोलिए कोई कुविचार, निजता कलुषित होय अरु फैले अत्याचार।४। कर्तव्य अधिकार में, मान कें चले जो भेद, नागरिक कभी  न बन सके, पढ ले चारों वेद।५। अंतर कभी न कीजिए , राष्ट्र देश समाज , मानव को ना बांट सकें, धर्म पंथ व जात।६। विश्व बंधुत्व का भाव हिय में रखो संजोय, भारत देश की  एकता सदा अखंडित होय।७।                                डॉ सत्येंद्र सिंह                                  पुणे, महाराष्ट्र     ...